Easy to live with Arthritis in an increasing age sagarvansi ayurveda

बढ़ती उम्र में जोड़ों के दर्द को अब बे वजह सहने की कोई जरूरत नहीं / Easy to live with Arthritis in an increasing age

उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर के ऊतक कमजोर पढ़ने लगते हैं।  शरीर के विभिन्न जोड़ घिसने लगते हैं । ऐसी स्थिति में जोड़ों में दर्द रहने लगता है भोजन के प्रति अरुचि होती है प्यास अधिक लगती है हाथ, पैर, जांघ, एड़ी, तथा कमर आदि के जोड़ों में दर्द होने लगता है, घुटनों में शोथ सूजन भी हो जाती है रोग बढ़ जाने पर चलते फिरते समय भयंकर कष्ट होता है बढ़ती उम्र के कारण जो गठिया होता है उसे आस्टियो अर्थराइटिस कहते हैं जोड़ों में सूजन या प्रदाह के कारण उत्पन्न गठिया को रियूमेटाइड अर्थराइटिस कहते हैं।जोड़ों में यूरिक अम्ल के जमा हो जाने के कारण उत्पन्न गठिया को गाउटी अर्थराइटिस कहते हैं। हीमोफिलिया में रक्त स्राव से जोड़ों में खून के थक्के जम जाने के कारण उत्पन्न गठिया को एक्यूट (गंभीर) अर्थराइटिस कहते हैं। क्षय रोग और आमवात में भी हड्डी के जोड़ प्रभावित होते हैं।

कंधों में जकड़न
कंधों को घेरनेवालीमांसपेशियों में सूजन आ जाती है। कंधे स्वभाविक रुप से हिल डुल नहीं पाते। हाइड्रोकार्टिसोनका इंजेक्शन तथा अल्ट्रासोनिक किरणों से सेंकने पर दर्द में लाभ पहुंचता है।

आस्टियो आर्थराइटिस
लगभग 50 से 55 वर्ष के बाद यह शुरू होता है। घुटने, कंधे और रीढ़ की हड्डी मैं दर्द होता है। जोड़ों का कार्टिलेज घिसने से के बाद हड्डी घिसनी शुरू हो जाती है किनारे धारदार हो जाते हैं। जोड़ हिलने-डुलने पर चटखने की आवाज होती है। धीरे-धीरे दर्द बढ़ता जाता है। जोड़ों की गति कम होती जाती है। ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी स्थिति में खूब चलें हल्का सा व्यायाम करें और औषधि का सेवन नियम पूर्वक करते रहें। ठीक हो जाने के बाद भी कभी पुनः दर्द शुरू हो सकता है। उठने-बैठने चलने-फिरने में कष्ट होने लगता है। घुटने पूर्णता क्षतिग्रस्त होने पर औषधि की अपेक्षा शल्यक्रिया आवश्यक हो जाती है।

रियूमेटाइड अर्थराइटिस
यह रोग लगभग 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में विशेषकर पाया जाता है। घुटने, टखने और हाथ के जोड़ विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। रोगी को  निरंतर कुछ ना कुछ  करते रहना चाहिए। इसके साथ ही आराम की भी आवश्यकता होती है। कर्टिसोन के इंजेक्शन से लाभ प्रतीत होता है। असाध्य अवस्था में शल्यक्रिया अपेक्षित होती है।

रीड की हड्डी का गठिया
रोगी आगे की ओर झुक जाता है। रीढ़ की हड्डी के अतिरिक्त कूल्हे और कंधे भी प्रभावित हो जाते हैं। यह रोग विशेष रूप से पुरुषों को होता है।

गाउट
घुटने के जोड़ के कार्टिलेज में यूरिक अम्ल के दाने जमा हो जाने के कारण यह अपंग कर देने वालारोग होता है। चिकित्सा में यूरिक अम्ल के दाने ना जमा होने पाएं इसका उपाय करते हैं। इसके लिए रक्त में यूरिक अम्ल की मात्रा कम करने का प्रयास करते हैं। मादक पदार्थ तथा मांसाहार इस रोग की उत्पत्ति में प्रमुख रुप से सहायक हैं इन्हें तुरंत बंद कर देना चाहिए शाकाहार और तनाव रहित दिनचर्या होनी चाहिए।

जोड़ों की टी॰ बी॰
यह रोग कुपोषण से होता है। रोग का आक्रमण जोड़ों पर होता है। फेफड़ों का क्षय रोग भी हड्डियों के जोड़ तक पहुंच जाता है। इसके भी लक्षण गठिया से मिलते-जुलते हैं। क्षय की दीर्घकालीन चिकित्सा से इसका उपचार किया जाता है।

चिकित्सा
* प्रातः एक पुटिया लहसुन आधा किलो दूध में डालकर उबालें। दूध के आधा रह जाने पर उसे छानकर पी लें। दूसरे दिन  2 एक पुटिया लेहसुन तीसरे दिन 3 एक पुटिया लहसुन इसी प्रकार 11 वें दिन 11 के पुटिया लहसुन दूध में उबालकर उसे छानकर दूध पी जाएं। 12 वें दिन से लहसुन की संख्या एक-एक करके कम करते जाएं।

* पुनर्नवा की जड़ 10 ग्राम को 100 ग्राम पानी में उबालें और 25 ग्राम शेष रहने पर छानकर पी लें।  

* योगराज गुग्गुल सुबह शाम दो-दो गोली गर्म पानी से लें।

* अश्वगंधा, चोपचीनी, पीपलामूल, सोंठ इसका समान मात्रा में चूर्ण सुबह-शाम दूध के साथ पियें।

* जोड़ों पर सेंक करके रेड़ी के पत्तों पर घी लगाकर बांधे।

* रात को सोते समय 10 ग्राम मेथी का दाना निगलकर पानी पी ले।

* दर्द के स्थान पर नारायण तेल की मालिश करें।

पथ्य
गेहूं, बाजरे की रोटी, मेथी, चौलाई, करेला, टिंडा, सेव, पपीता, अंगू,र खजूर, लहसुन, इत्यादि वस्तुओं का सेवन हितकर है।

अपथ्य
चावल, आलू, गोभी, मूली, सेम, चना, उर्द की दाल, केला, संतरा, नींबू, अमरूद, टमाटर, दही तथा समस्त वायुकारक पदार्थ दिवाशयन अधिक परिश्रम इत्यादि रोग को बढ़ाते हैं।