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आयुर्वेदिक नजरिए से उच्च रक्तचाप व आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों द्वारा उच्च रक्तचाप का उपचार / what is high blood pressure treatment of high blood pressure according to ayurveda

आयुर्वेद की दृष्टि से उच्च रक्तचाप क्या है।

आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली में 'उच्च रक्तचाप' नाम का कोई रोग नहीं है-- यह मानना सर्वथा भूल है। इसका वर्णन आयुर्वेद शास्त्रों में वात रोगों के अंतर्गत आता है। इसका आयुर्वेदिक नाम शिरागत वात है। रक्त वाहिनियों तथा धमनियों पर रक्त का अधिक दबाव पढ़ना और उनका कठोर हो जाना ही शिरागत वात है। शिरा और कोशिकाओं की दीवारों पर भी रक्त के अधिक दबाव के कारण उच्च रक्तचाप होता है। यह दो प्रकार का होता है

* उच्च रक्तचाप या शिरागत वात

* दूसरा न्यून रक्तचाप (लो ब्लड प्रेशर)

 

 यहां पर केवल उच्च रक्तचाप का ही विचार किया जा रहा है।

 सम्प्राप्ती -- मनुष्य का हृदय लगभग 7 तोला रक्त एक बार के संकोचन के समय धमनियों मैं फेंकता है। इससे पहले भी धमनी में रक्त पूर्णरूप से भरा रहता है। धमनी में अतिरिक्त रक्त के फेंके जाने से धमनियों में दवाव पड़ता है और उनकी दीवारें फैल जाती हैं। यह धमनियों की संकुचनशीलता के कारण संभव हो सकता है। इस ओर विशेष ध्यान केवल आयुर्वेद में ही दिया गया है। दूसरा परिणाम रक्त के कारण धमनियों में एक लहर पैदा होती है जो प्रारंभ में प्रबल होती है और धीरे-धीरे कोशिकाओं में पहुंचने से पहले अदृश्य हो जाती है धमनी जितनी कठोर होगी लहर उतनी ही तीव्र गति से चलेगी। जितनी संकुचनशील ता होगी उतनी ही धीमी गति से चलेगी।

उच्च रक्तचाप के लक्षण

1. रोगी के सिर में विशेषकर सिर के पीछे की ओर कनपटियों अर्थात कान के पीछे के भाग में दर्द होता है। यह सिरदर्द कभी कम अथवा कभी अधिक होता है।

2. रोगी को सुबह और शाम को चक्कर आने लगता है।

3. हृदय की गति (चाल) अधिक हो जाती है। हृदय प्रदेश पर दर्द भी महसूस होता है। यह कभी भी हो सकता है।

4. रोगी का कार्य करने में मन नहीं लगता है। वह स्वभाव से चिड़चिड़ा हो जाता है। थोड़ा सा कार्य करने पर भी उसे थकान आ जाती है।

5. रोगी की स्मरणशक्ति धीरे-धीरे कम होने लगती है।

6. रोगी को निद्रा कम आती है और आती भी है तो टूट टूटकर आती है।

7. भूख कम लगने लगती है और खाने में अरुचि होने लगती है।

8. पेशाब की मात्रा कम होने लगती है। जांच करवाने पर पता चलता है कि पेशाब में शक्कर अलब्यूमन अथवा यूरिक एसिड बढ़ गया है।

 9. उच्च रक्तचाप होने पर नाक और शरीर के अन्य अंगों से रक्तस्त्राव होने लगता है। 10. मल आदि का अनियमित त्याग और उसमें बदबू अधिक आती है।

 

आयुर्वेदिक चिकित्सा

आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार 'वात' 'कफ' और 'पित्त' का सम होना ही स्वस्थ शरीर का लक्षण बताया गया है। सदा स्वस्थ एवं निरोगी रहने के लिए आयुर्वेदिक स्वस्थवृत्त के निम्न नियमों का पालन करना आवश्यक है—

* कायिक, वाचिक एवं मानसिक रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करें।

* शारीरिक और मानसिक कार्य उतना ही करें जिससे अधिक श्रम ना पड़े।

* नित्य प्रातः वन अथवा घने, पेड़ पौधों वाले स्थान पर घूमने जाएं जहां प्रकाश एवं स्वच्छ हवा का अच्छा प्रबंध हो।

* नित्य तिल के तेल का अभ्यंग करके गुनगुने पानी से स्नान करें।

* रात्रि में सूर्यास्त से पहले भोजन करें और निश्चित समय पर सोए।

* सत्साहित्य पढ़ने लिखने की थोड़ी थोड़ी आदत अवश्य रखनी चाहिए मस्तिष्क को थकान ना आए ऐसा मानसिक कार्य करें।

* प्रातः शौच शुद्धि हो जाने की ओर विशेष ध्यान रखें।

 

उच्च रक्तचाप की औषधि

(क) वृहद् वातचिंतामणि रस इसमें मिलाए हुए द्रव्यों में—

1. स्वर्ण भस्म वह मधुर स्त्रिग्ध और वृहद् गुणयुक्त होने से वात का शमन और रक्तप्रसादन कर सेन्द्रिय विष का शमन करता है। स्त्रिग्ध और शीतल गुणों से जीव रक्तवाहिनी शिराओं की कठोरता कम करता है। रसायन होने से वृद्धावस्था की बात बाहुल्य को नियमित करता है।

2. रौप्य भस्म (चांदी की भस्म) यह अम्ल रस शीतल  स्त्रिग्ध और मधुर विपाक वाला होने से शिराओं के कोने के कफ-अंशको बढायेगा इससे कठोरता कम होगी। यह शरीर के सेंद्रिय विष को निकालकर आकुच्ञन, प्रसाधन आदि गुणों की वृद्धि करेगा। शरीर के अंग प्रत्यंगों के रोगों की दुर्बलता दूर होगी और हृदय शक्तिशाली बनेगा।

3. लौह भस्म यह हृदय व्यथाजन्य रोग नष्ट करता है। लौह भस्म के सेवन से शरीर शुद्ध होकर रक्ताणु बलवान् बनते हैं। रसायन होने से यह वृद्धावस्थाजन्य प्रबृध्द बात का नियमन करता है। यह व्याधिको दूर करके शरीर को निरोग बनाता है।

4. अभ्रक भस्म यह स्त्रिगध तथा शीतल होने से वायु का शमन करता है।मधुर रसात्मक होने से वात का शमन करता है तथा जीव रक्तवाहिनी शिराओं में मृदुता लाता है।

5. रस सिंदूर यह हृदय के लिए पौष्टिक वातनाशक और विषनाशक होने से उच्च रक्तचाप में हितकर है।

6. घी क्वार उदरस्थ अंगों को व्यवस्थित कर दूषित अंशो को शरीर से बाहर करने के कारण पव्काशय को स्वस्थ बनाता है। इस प्रकार 'वृहद् वातचिंतामणि रस' उच्च रक्तचाप रोगों में एक उपयुक्त औषधि है।

(ख) योगेंद्र रस- योगेंद्र रस में स्वर्ण का प्रमाण अपेक्षा या अधिक होने से सेंद्रिय विष का नाश कर रक्त का प्रसादन करता है।  रक्त का बलकारक होने से हृदय की संकुचन एवं प्रसारण-प्रक्रिया को नियमित करता है। जिससे रक्तचाप की वृद्धि कम हो जाती है। यह अप्रत्यक्ष रुप से पाचन संस्थान और मूत्र संस्थान पर भी अपना असर करता है इस रसायन के सेवन से 'अजीर्ण वात विकार', 'निद्रानाश' आदि रोग भी दूर हो जाते हैं।

 

रोग की विशेष अवस्था में

1. यदि सिर दर्द अधिक हो तो कपर्दी भस्म तथा अकीक भस्म आंवले के मुरब्बे के साथ दें। रात्रि में वृहद् वातचिंतामणि रस और सर्पगंधा चूर्ण मिलाकर दूध के साथ दें।

2.  अनिद्रा हो तो सुबह शाम सर्पगंधा चूर्ण और वृहद् वातचिंतामणि रस मिलाकर दूध के साथ दें। रक्त दबाव कम करने के लिए सर्पगंधा एलोपैथिक चिकित्सक भी प्रचुर मात्रा में उपयोग में लाते हैं। सर्पगंधा स्वयं उष्ण वीर्य है। पित्त प्रकृति वाले को प्रवाल पिष्टी या सिता मिलाकर देने से अच्छा लाभ होता है। रक्तचाप की अत्यंत बढ़ी हुई अवस्था में पक्षाघात रोग होने की संभावना रहती है। इसलिए उच्च रक्तचाप वृद्धि को पक्षाघात का सचेतक मान लेना चाहिए। पक्षाघात होने से पूर्व उच्च रक्तचाप वृध्र्दी में शिराओं का कठोर होना आवश्यक है। 'रक्तचाप वृध्दी'- के और 'शिरावगत वात रोग' के लक्षण में कोई अंतर नहीं है। अनुभवी वैधों से परामर्श कर रोगी को लाभ लेना चाहिए। कोई भी औषधि कम मात्रा में लेना रोगी के लिए कोई भी लाभ ना देगी। इससे उन औषधियों की उपयोगिता नहीं है यह मान लेना एक भ्रम है। औषधियों का प्रभाव शीघ्र हो इसके लिए मात्रा से अधिक औषधि नहीं लेनी चाहिए। अधिक लेने से हानि हो सकती है, इसलिए प्रत्येक आयुर्वेदिक औषधि को अनुभवी शिक्षक वैध के मार्गदर्शन में ही लेना चाहिए।