Ayurvedic treatment of eye diseases like night blindness in hindi sagarvansi ayurveda

रतौंधी जैसे नेत्र रोग का सफल आयुर्वेदिक उपचार / Ayurvedic treatment of eye diseases like night blindness in hindi

आयुर्वेद द्वारा रतौंधी का सिद्ध सफल उपचार (Night Blindness)

 

नेत्र रोगों में रतौंधी काफी अधिक जाना मना रोग है। इस रोग से ग्रसित होने वाले अधिकतर आर्थिक स्थिति से तंग या कम आय वाले व्यक्ति होते हैं। भारत भर में यह रोग तमिलनाडु, आसाम, आंध्र प्रदेश में बहुत अधिक देखने को मिलता है परंतु कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि रतौंधी के मरीजों की संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, गुजरात व राजस्थान जैसे राज्यों में भी रतौंधी का अधिक असर देखने को मिल रहा है।यह एक प्रकार का ऐसा रोग है जिसमें पीड़ित व्यक्ति को रात्रि के समय या अंधेरा होने पर साफ और स्पष्ट दिखाई नहीं देता है। 

 

रतौंधी के उत्पन्न होने के कारण अत्याधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार रतौंधी के होने का कारण मानव शरीर में विटामिन 'ए' की कमी का होना है और इस बीमारी के शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रोग अधिकांश कम आय वर्ग के लोगों के साथ देखने को मिलता है क्योंकि कम आय वर्ग का व्यक्ति अधिक कुपोषण का शिकार होता है जिससे उनके शरीर में विटामिन 'ए' की अपर्याप् मात्रा की वजह से व्यक्ति रतौंधी से ग्रस्त हो जाता है। आयुर्वेदिक शास्त्रों के अनुसार कफ दोष नेत्र के तीसरे पटल में पहुंच जाता है तब रतौंधी रोग की शुरूवात होती है या कहें कि तब वह विकसित होने लगता है। आयुर्वेदाचार्यों का मानना है दिन के समय सूर्य के प्रभाव से नेत्रगत कफ साफ हो जाता है। जिससे रोगी को दिन के समय देखने में किसी प्रकार की असुविधा नहीं होती है परंतु उसी रोगी को रात के समय परेशानी होती है क्योकि रात के समय पुनः कफ उसके नेत्र पटलों  पर आ जाता है जिससे उसे रात के समय देखने में असुविधा या दिक्कत महसूस होती है।

 

रोग के लक्षण

रतौंधी के रोगी को दिन में तो अच्छी तरह से दिखाई देता है परंतु रात के समय वह देख पाने में बिल्कुल असमर्थ हो जाता है। रतौंधी रोगी की नेत्र परीक्षा से पता चलता है क्योकि इस रोग में नेत्र का श्वेत भाग शुष्क दिखाई देने लगता है। नेत्र गोलका धुंधला तथा गंदा सा हो जाता है। बीच का तारा छिद्रित सा दिखाई देता है और कर्निया के पार्श्र्व में तिकोनी की आकृति दिखाई देने लगती है। श्लेष्मापटेल से चिकना और सफेद रंग का स्त्राव होने लगता है।

आयुर्वेदिक उपचार

1. रतौंधी की सबसे सस्ती और सफल चिकित्सा चौलाई का साग है चौलाई की सब्जी भैंस के घी में बनाकर प्रतिदिन सूर्यास्त के बाद जितना खाना है खा ले परन्तू रोटी, भात आदि कुछ भी ना खाएं प्रारंभिक अवस्था के रोग के लिए 1 सप्ताह तक व चरम अवस्था के रोग के लिए दो माह तक इसका सेवन करते रहना चाहिए।

 

2. कमल केसर, नीलकमल, रसौंत, गौरिक सभी 4 ग्राम की मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें और उन सभी को गोमय रस में भिगोकर बत्तियां बनाकर रख लें अंजन की तरह लगाने से रतौंधी का प्रकोप कम होने लगता है। हरीतकी 12.5 ग्राम, आमलकी 50 ग्राम, यष्टिमधु 50 ग्राम, बहेड़ा 25 ग्राम, शतावरी 5 ग्राम, दालचीनी 5 ग्राम तथा शक्कर 150 ग्राम लेकर बारीक चूर्ण बनाकर कपड़े से छान कर रख लें इसमें प्रतिदिन 3 से 4 ग्राम तक घी या शहद के साथ मिलाकर 6 से 7 सप्ताह तक सेवन करने से यह नेत्रों के सभी रोगों पर रामबाण की तरह काम करता है।

 

3. शंखनाभी, विभीतक, हरड़, पीपल, काली मिर्च, कूट,मैनसिल, खुरासानी, वच (Sweet Flag Root)  इन सभी को 5-5 ग्राम की मात्रा में महीन पीसकर बकरी के दूध के साथ मिलाकर बत्तीयाँ बना लें और रोज रात में सोने से पहले पानी में घिसकर आँखों में लगाने से रतौंधी रोग ठीक होने लगता है।