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मोटापे की समस्या से है परेशान। यहां है आपकी समस्या का समाधान / Loosing weight is too easy now read this article

 मोटापा -- कारण एवं निवारण

आधुनिक तथाकथित प्रगति के साथ मोटापा तीव्रता से बढ़ रहा है। आज वैज्ञानिक खोजों के कारण से अनेक सुख सुविधाओं के साधन उपलब्ध हो गए हैं फल स्वरुप मनुष्य पहले जो भी  शारीरिक कार्य करता था निरंतर लगातार वह कम होता जा रहा है एवं भोज्य पदार्थ में स्वाद को प्राथमिक्ता दी जा रही हैं, जिससे आहार में लोगों की रुचि बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि वर्तमान समय में मोटापा एवं तज्जनित विकारों की उत्पत्ति तीव्रता से बढ़ रही है मोटापा एक शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रोग है।  मोटापा रोग स्वयं में अधिक हानिकारक एवं घातक ना होते हुए भी अनेक समस्याओं की जड़ है जैसे रक्तचाप,(ह्यपरटेंशन) मधुमेह,(डायबिटीज) पक्षाघात,(सरबरोबस्कुलर) एवं संधिवात(ऑस्टिओआर्थरिटिस) आदि जैसी अनेक गंभीर समस्या होने का मुख्य कारण माना जाता है। आचार्य चरक द्वारा वर्णित अधिक मोटापे के कारणों को तीन भागों में बांटा गया है।

1. अति भोजन - अत्यधिक मात्रा में भारी (गुरु), मधुर, सीट, स्निग्ध (चर्बी वाले वसा तत्व) आदि गुणों से युक्त भोजन पदार्थों का प्रयोग अधिक मोटापे का प्रथम कारण होता है।

2. अव्यायाम - अव्यायाम, शारीरिक कार्य की कमी, व्यायाम न करना व्यवाय की कमी, दिवास्वप्र, अत्यधिक सुख, मानसिक चिंता की न्यूनता, शारीरिक श्रम न करना आदि।

3. वंशानुगत बीजदोष - माता पिता के बीज के अनुसार स्वभावतः शरीर मोटा हो जाता है साथ ही अधिक तनाव भी अधिक मोटापे का कारण हो सकता है। जैसे कि आचार्य चरक ने कहा है कि चिंता, शोक, क्रोध, भय और दुख जैसी मानसिक अवस्थाओं में मात्रा पूर्वक किया गया भोजन भी आमका उत्पादक होता है जो आगे चलकर मोटापे का कारण बन सकता है। शरीर में मेदा धातु की अधिकता होने से शरीर मोटा हो जाता है अन्य सुकराती धातुएं अल्प मात्रा में बनती हैं।

 

चिकित्सा

आयुर्वेद मे चिकित्सा कारण एवं रोग प्रक्रिया को ध्यान में रखकर की जाती है। चिकित्सा के 3 अंग होते हैं

* निदानपरिवर्जन - अर्थात उन कारणों का परित्याग जिनसे रोग की उत्पत्ति हो रही हो मोटापा रोग के संदर्भ में कारणों को उपर्युक्त आधार पर तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है।

(क) आहारपरक

(ख) बिहारपरक 

(ग) मानसिक भाव दूसरा

*  अपकर्षण - अर्थात जिस दोष या दूष्यों की वृद्धि हो गई हो उसे शरीर से बाहर निकालना यह क्रिया दो प्रकार से की जा सकती है शोधन द्वारा शमन द्वारा।

* प्रकृतिविघात - अर्थात शरीर में ऐसी व्यवस्था का सृजन करना जिससे पुनः दूष्यों में दोषों का स्थान संश्रय न हो। आगे संक्षेप में निदान परिवर्जन का विवेचन किया जा रहा है।

निदान परिवर्जन मोटापे के रोगियों को अपने आहार विहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

* आहार- आयुर्वेद शास्त्रों में गुरु, मधुर, शीत एवं स्निग्ध आहार को मोटापा पैदा करने वाला कहा गया है मोटापा घटाने के लिए मूल स्वरूप से आहार में निम्न संशोधन किए जाने चाहिए।

आहार के नियमों का पालन- आयुर्वेद में भोजन संबंधित दो प्रकार के नियम बताए गए हैं—

(क) भोजन चयन निर्माण के नियम- प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल उपयोग संस्था तथा उपभोक्ता।

(ख) भोजन करने के नियम उष्ण, स्निग्ध, मात्रापूर्वक, भोजन के पच जाने पर वीर्य के अविरुद्ध अपने मन के अनुकूल स्थान पर, सामग्रियों सहित आहार को न अधिक जल्दी  न अधिक देर से न बोलते हुए न हंसते हुए अपने आत्मा का विचार कर आहार द्रव्य में मन लगाकर भोजन करना चाहिए।इस प्रकार आहार को निर्धारित करते समय स्थूलता रोगों में लघु, रुक्ष, ऊष्म,तिक्त तथा कटु द्रव्यों का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए। भोजन नियमित समय पर करना चाहिए। दोनों भोजनकाल के बीच में कुछ भी नहीं लेना चाहिए जहां तक संभव हो जल को भी निश्चित समय पर ग्रहण करना चाहिए। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के उपक्रमों में सर्वाधिक संक्षिप्त प्रशंसित एवं प्रचलित विधियों में से एक है। लंघन का अर्थ मात्र भोजन ना लेना ही नहीं है अपितु और प्रक्रिया को इस प्रकार निर्धारित किया जाए कि शरीर को कम से कम आवश्यक पोषक तत्व मिले जिस से अत्यधिक मात्रा में शरीर में एकत्रित आम-मलरूप धातु का जारण (गलाने या पचने की क्रिया) हो सके।

 

बिहार

अधिक मोटापे के रोगी को अधिक से अधिक संभावित शारीरिक व्यायाम करना चाहिए व्यायाम में शारीरिक व्यायाम में तीव्र गति से पैदल चलना सर्वाधिक सुरक्षित एवं लाभकर व्यायाम माना गया है। आयुर्वेद में स्वस्थ व्यक्ति के लिए कम से कम दो-तीन बार व्यायाम करना चाहिए जिसमें पैदल चलना तैरना तैरना आदि शामिल है। फोम आदि के गद्दों की जगह पर पतले बिछावने पर या तख्त पर सोना लाभदायक रहेगा। रोगी को कम से कम आवश्यक निद्रा लेनी चाहिए रात को थोड़ा देर से सोना और प्रातः जल्दी जागना तथा दिन में ना सोना इस रोग में लाभप्रद रहेगा।

मानसिक : मानसिक भाव से भावों में बहुत ज्यादा संतुष्टि एवं सुखानुभूति का अनुभव होने से मोटापे में वृद्धि होती है अतः यदि संभव हो तो जहां मानसिक कष्ट की भी अनुभूति हो ऐसे कृत्रिम वातावरण का निर्माण भी लाभप्रद हो सकता है। उसे मानसिक श्रम भी करना चाहिए। इसके साथ ही यहां चिकित्सा प्रयोग भी दिए जा रहे हैं जो सरलता से किए जा सकते हैं—

(क) प्रातः काल जल में मधु मिलाकर सेवन करने से मोटापे का नाश होता है।

(ख) गरम-गरम अन्न तथा चावल के माण्ड़ का पान करने से मनुष्य पतले शरीर वाला हो जाता है।

(ग) त्रिकटु, चित्रक, जीरा आदि चूर्ण को मिलाकर दही के पानी के साथ सत्तू पान करने से मोटापे का नाश होता है।

(घ) एक तोले भर बेर के कोमल पत्तों को पीसकर एक सेर कांजी में डालकर पेय बनाएं इस पेय के पीने से मोटापे रोग नष्ट होता है।

(ड़) अरणी की जड़ का काढा बनाकर उसमें चार रत्तीभर शुध्द शिलाजीत मिलाकर प्रतिदिन पीने से मोटापा रोग नष्ट होता है।