Ayurvedic treatment and home remedies for stones in gall bladder sagarvansi ayurveda

पित्तशय व पित्त की थैली मैं पथरी का आयुर्वेदिक व घरेलू उपचार / Ayurvedic treatment and home remedies for stones in gall bladder

पित्ताशय की पथरी

 

पित्ताशय जिसे अंग्रेजी भाषा में गाल ब्लैडर भी कहा जाता है। यह मानव शरीर में पेट के दाएं हिस्से में ऊपर की तरफ होता है। गाल ब्लैडर देखने में नाशपाती जैसे आकार का होता है और एक तरह से थैली जैसा अंग है। यह मानव शरीर में लीवर के बिल्कुल नीचे की तरफ होता है। मानव शरीर में गाल ब्लैडर का कार्य लिवर के द्वारा बनाए गए पित्त को एकत्रित करके उसे गाढ़ा बनाए रखने के लिए गाल ब्लैडर का उपयोग होता है और यही गालब्लैडर का मुख्य कार्य होता है। लिवर के द्वारा बनाए गए पित्त नाम के रसायन का काम वसायुक्त भोजन वसायुक्त पदार्थों को आसानी से पचाने में सहयोग करना होता है और गोल ब्लैडर या पित्त की थैली को लिवर द्वारा बनाए गए पित्त नामक रसायन अपने अंदर बनाए रखना और आवश्यकता के अनुसार उचित मात्रा में पित्त  नामक रसायन का स्त्राव करना होता है। एक स्थाई जगह पर एक छोटी सी परन्तु कठोर कंकड़ी जैसी उत्पन्न हो जाती है। ऐसी दो जगह मानव शरीर में होती हैं जहां पथरी उत्पन्न होती है उनमें से एक तो किडनी और दूसरी गालब्लैडर होती है। किडनी की पथरी के बारे में हम आपको पूर्व के लेख में उसके उपचार के बारे में बता चुके हैं उसे आप हमारे वृक्क नाम के हेडिंग में पढ़ सकते हैं। आज इस लेख में हम आपको गॉल ब्लैडर की पथरी के उपचार के बारे में बता रहे हैं।

 

पित्ताशय की पथरी के कारण

यह है अश्मरी पित्ताशय में छोटे या बड़े आकार में सैकड़ों की संख्या में हो सकती हैं इस पथरी के बनने का मुख्य कारण अभी तक ज्ञात नहीं है परंतु यह माना जाता है कि मोटापा, मधुमेह, अनुवांशिक तथा रक्त संबंधी बीमारियों की वजह से हो सकती है अधिक समय तक भूखे रहने से, एकदम वजन घटने से भी पित्ताशय की पथरी हो सकती है। सामान्यता यह 30 से 40 वर्ष की आयु में बनने की आशंका अधिक रहती है। यह पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को अधिक होती है। यह कई बार पित्त की थैली पर बार-बार सूजन आने से भी हो सकती है।

 

पित्ताशय की पथरी के लक्षण

आमतौर पर अधिकांश लोगों में पित्ताशय की पथरी से कोई विशेष कष्ट नहीं होता है। पथरी के कारण पेट के दाहिने हिस्से में दर्द होता है जो कभी कभी दाएं कंधे एवं दाएं पीठ की ओर भी महसूस होता है। कभी-कभी दर्द के साथ उल्टी होती है इन लक्षणों के साथ अन्य लक्षण जैसे उदरशूल, पृष्ठशूल, अजीर्ण, अपचन कभी-कभी अम्लपित्त की समस्या भी होती है। चिरकालीन अवस्था में पीलिया रोग भी हो सकता है।

 

उपचार

 

उपचार में पित्तनाशक चिकित्सा करते हैं। पथरी को गलाने के लिए क्षार एवं लवण रस का उपयोग करते हैं नारिकेल लवण का प्रयोग किया जाता है जो पाचन एवं पित्तनाशक होता है। यह अम्लपित्त को दूर करता है एवं पित्त शोषजन्य शूल का नाश करता है। उदरशूल एवं अम्लपित्त में हिंग्वाष्टक चूर्ण, सूतशेखर रस, शंखवटी, प्रतापलंकेश्वर रस, एवं रोहतक एवं गड़ूची काढ़ा आदि का उपयोग करते हैं इसके साथ ही आरोग्यवर्धिनी वटी का प्रयोग भी करना चाहिए। नवायस लौह एवं शोणितस्थापन गण चूर्ण/काढ़ा का उपयोग पीलिया की अवस्था में करते हैं। बार बार पित्ताशय में सूजन आना एवं लक्षणों के अधिक बढ़ जाने पर सर्जरी ही एकमात्र विकल्प होता है।

 

पित्ताशय की पथरी का घरेलू उपाय

5 दिनों तक सेब का जूस पिएं सेब का यह रस घर पर ही बनाएं जूस के साथ ही दिन भर में तीन से चार सेव भी खाएं छठे दिन रात का खाना ना लें इस छठे दिन में शाम के समय 5:00 से 6:00 बजे के आसपास गुनगुने पानी के साथ एक चम्मच सेंधा नमक लें जिसे लाहौरी नमक भी कहा जाता है इससे ठीक 2 घंटे बाद लगभग 7:00 से 8:00 बजे के आसपास फिर से गर्म पानी के साथ एक चम्मच सेंधा नमक लें अंत में लगभग रात में 9:00 से 10:00 बजे के बीच आधा कप जैतून का तेल यानी ऑलिव ऑयल को आधा कप नींबू के रस में मिलाकर पी जाएं।

 

किसी भी तरह का आयुर्वेदिक उपचार करने से पहले किसी प्रशिक्षित आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह जरूर लें